शिवसागर (रोहतास): शिवसागर प्रखंड मुख्यालय स्थित शिव मंदिर परिसर में आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा के छठे दिन श्रद्धालु भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में सराबोर नजर आए। कथा व्यास आचार्य श्री रणधीर ओझा ने भगवान कृष्ण की बाल लीलाओं, गोवर्धन पूजा और रासलीला के प्रसंगों का भावपूर्ण वर्णन किया। कथा सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। भक्ति गीतों और संकीर्तन के बीच पूरा परिसर ‘राधे-राधे’ और ‘जय श्रीकृष्ण’ के जयघोष से गूंजता रहा।
बाल लीलाओं में छिपा प्रेम और सहजता का संदेश
बक्सर से पधारे आचार्य रणधीर ओझा ने श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि भगवान की प्रत्येक लीला में भक्ति, प्रेम और जीवन को दिशा देने वाला संदेश निहित है। उनके अनुसार बाल लीलाएं मनुष्य को सहजता, सरलता, निष्कपटता और प्रेम के साथ जीवन जीने की प्रेरणा देती हैं। कथा के माध्यम से उन्होंने श्रद्धालुओं को बताया कि आध्यात्मिकता केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यवहार और संबंधों में भी उसका प्रभाव दिखाई देना चाहिए।
आचार्य ने कहा कि बाल स्वरूप में श्रीकृष्ण की लीलाएं भक्तों के मन में आत्मीयता और विश्वास का भाव जगाती हैं। इन प्रसंगों को सुनने और समझने का उद्देश्य केवल धार्मिक कथा का आनंद लेना नहीं, बल्कि उसमें निहित मूल्यों को अपने जीवन में अपनाना भी है।
गोवर्धन लीला से प्रकृति के सम्मान की सीख
गोवर्धन लीला का वर्णन करते हुए आचार्य श्री ने प्रकृति और पर्यावरण के प्रति सम्मान का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने इंद्र के अहंकार का मर्दन कर समाज को यह समझाया कि मनुष्य को अहंकार से दूर रहना चाहिए और प्रकृति, गौ तथा अपने कर्म के प्रति कृतज्ञ रहना चाहिए। गोवर्धन पूजा का प्रसंग सामूहिकता, विनम्रता और प्रकृति के महत्व को समझने का अवसर देता है।

उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि प्रकृति से मनुष्य का जीवन जुड़ा हुआ है। इसलिए प्राकृतिक संसाधनों के प्रति सम्मान और संरक्षण का भाव जरूरी है। गोवर्धन प्रसंग को इसी व्यापक दृष्टि से समझने की जरूरत है। कथा में इस संदेश को धार्मिक भाव के साथ सरल उदाहरणों के माध्यम से रखा गया, जिससे उपस्थित श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे।
रासलीला को आध्यात्मिक समर्पण का प्रतीक बताया
रासलीला के प्रसंग पर आचार्य रणधीर ओझा ने कहा कि रास को केवल सांसारिक दृष्टि से नहीं, बल्कि आध्यात्मिक अर्थ में समझना चाहिए। यह भगवान और भक्त के बीच प्रेम तथा पूर्ण समर्पण का प्रतीक है। जब मनुष्य अपने अहंकार को छोड़कर ईश्वर के प्रति समर्पित होता है, तभी भक्ति का वास्तविक आनंद अनुभव कर सकता है।
उन्होंने कहा कि श्रीकृष्ण की भक्ति व्यक्ति को मोह-माया से ऊपर उठाकर प्रेम, करुणा और समर्पण की ओर ले जाती है। निष्काम प्रेम को भक्ति का सर्वोच्च स्वरूप बताते हुए उन्होंने श्रद्धालुओं से कथा के संदेशों को अपने परिवार और दैनिक व्यवहार में उतारने का आह्वान किया।
भजन-कीर्तन से भक्तिमय हुआ कथा परिसर
कथा के दौरान श्रीकृष्ण की लीलाओं से जुड़े प्रसंगों पर श्रद्धालु भावुक होते रहे। भक्ति गीतों और संकीर्तन ने वातावरण को भक्तिमय बना दिया। ‘गोवर्धन महाराज की जय’ सहित विभिन्न जयघोषों से परिसर गूंजता रहा। श्रद्धालुओं ने कहा कि आचार्य की सरल और प्रभावशाली शैली के कारण श्रीमद्भागवत के गूढ़ आध्यात्मिक संदेशों को समझना सहज हो रहा है।

सात दिवसीय आयोजन के छठे दिन की कथा में धर्म और भक्ति के साथ जीवन के व्यावहारिक मूल्यों पर भी चर्चा हुई। श्रद्धालुओं के अनुसार कथा उन्हें परिवार और समाज में प्रेम, विनम्रता, करुणा तथा समर्पण जैसे गुणों को अपनाने की प्रेरणा दे रही है। आयोजन के अंतिम दिन भी श्रद्धालुओं की भागीदारी रहने की उम्मीद है।
