30 अक्टूबर 1883 को दीपावली के दिन स्वामी दयानंद सरस्वती का अजमेर में निधन हुआ। वे उन्नीसवीं सदी के प्रमुख धार्मिक और सामाजिक सुधारकों में गिने जाते हैं तथा आर्य समाज के संस्थापक थे। उन्होंने धार्मिक आचरण में विवेक, वेदों के अध्ययन और सामाजिक कुरीतियों के विरोध पर जोर दिया। उनका संदेश “वेदों की ओर लौटो” उनके सुधारवादी विचारों का सार माना जाता है।
प्रारंभिक जीवन और सत्य की खोज
स्वामी दयानंद सरस्वती का जन्म 1824 में गुजरात के टंकारा में मूलशंकर के रूप में हुआ था। परंपरागत धार्मिक वातावरण में पले-बढ़े मूलशंकर ने युवावस्था में जीवन, आस्था और धार्मिक मान्यताओं से जुड़े प्रश्नों पर गहराई से विचार करना शुरू किया। सत्य की खोज में उन्होंने घर छोड़ा और विभिन्न विद्वानों तथा साधुओं से ज्ञान प्राप्त किया। बाद में वे स्वामी विरजानंद के शिष्य बने और वैदिक अध्ययन पर विशेष ध्यान दिया।
‘वेदों की ओर लौटो’ का विचार
दयानंद सरस्वती का मानना था कि धार्मिक जीवन का आधार वेदों का अध्ययन और विवेकपूर्ण समझ होनी चाहिए। उन्होंने उन प्रथाओं और मान्यताओं की आलोचना की जिन्हें वे वेदों की मूल भावना से असंगत मानते थे। मूर्तिपूजा, अंधविश्वास और कर्मकांड के कुछ रूपों पर उनकी आलोचना ने उस समय व्यापक बहस को जन्म दिया। उनके विचारों का उद्देश्य धार्मिक जीवन को तर्क, नैतिकता और मूल ग्रंथों की ओर लौटाने के रूप में प्रस्तुत किया गया।
आर्य समाज की स्थापना
स्वामी दयानंद ने 1875 में बंबई (अब मुंबई) में आर्य समाज की स्थापना की। इस संगठन ने वैदिक विचारों के प्रचार, शिक्षा, सामाजिक सुधार और सार्वजनिक बहस को बढ़ावा दिया। आगे चलकर आर्य समाज ने देश के विभिन्न क्षेत्रों में विद्यालयों, शिक्षण संस्थानों और सामाजिक गतिविधियों के माध्यम से प्रभाव स्थापित किया। संगठन के भीतर समय के साथ विभिन्न विचारधाराएँ और कार्य-पद्धतियाँ भी विकसित हुईं।

सामाजिक सुधार और शिक्षा
दयानंद सरस्वती ने जन्म के आधार पर सामाजिक ऊँच-नीच, स्त्रियों की शिक्षा पर रोक और कई प्रचलित सामाजिक कुरीतियों का विरोध किया। उन्होंने महिलाओं की शिक्षा, विधवा-विवाह और सामाजिक जीवन में नैतिक सुधार के पक्ष में विचार रखे। उनके विचारों और आर्य समाज की गतिविधियों ने उन्नीसवीं सदी के सुधार आंदोलनों के व्यापक परिदृश्य में योगदान दिया। उनके सभी विचारों को आधुनिक दृष्टिकोण से एक जैसा मानने के बजाय उन्हें अपने समय के सामाजिक और धार्मिक विमर्श के संदर्भ में समझना उचित है।
लेखन और वैचारिक प्रभाव
उनकी प्रमुख रचनाओं में सत्यार्थ प्रकाश शामिल है, जिसमें उन्होंने धार्मिक मान्यताओं, समाज और नैतिक जीवन पर अपने विचार प्रस्तुत किए। उनकी स्पष्ट और बहसपरक शैली ने समर्थकों के साथ-साथ आलोचकों को भी आकर्षित किया। उनके विचारों ने धार्मिक सुधार, शिक्षा और सामाजिक संगठन के क्षेत्रों में लंबे समय तक चर्चा को प्रभावित किया।
अजमेर में निधन
1883 में स्वामी दयानंद सरस्वती का स्वास्थ्य गंभीर रूप से बिगड़ गया और 30 अक्टूबर को अजमेर में उनका निधन हुआ। यह तिथि दीपावली के दिन पड़ने के कारण उनकी स्मृति से जुड़ी विशेष पहचान रखती है। उनके अंतिम दिनों और मृत्यु से जुड़ी घटनाओं के विवरण विभिन्न ऐतिहासिक वर्णनों में मिलते हैं, लेकिन उनके व्यापक प्रभाव का आकलन उनके सुधारवादी विचारों और उनसे प्रेरित संस्थागत गतिविधियों के आधार पर भी किया जाता है।
निष्कर्ष
स्वामी दयानंद सरस्वती का जीवन उन्नीसवीं सदी के भारत में धार्मिक पुनर्विचार और सामाजिक सुधार की महत्वपूर्ण धारा का प्रतिनिधित्व करता है। आर्य समाज की स्थापना, शिक्षा पर जोर, सामाजिक कुरीतियों की आलोचना और वैदिक अध्ययन के उनके आग्रह ने भारतीय सार्वजनिक जीवन में एक स्थायी विमर्श छोड़ा। 30 अक्टूबर को उनके देहावसान की स्मृति उनके विचारों, प्रभाव और ऐतिहासिक संदर्भ पर विचार करने का अवसर देती है।

