27 अक्टूबर 1904 को कोलकाता में जन्मे जतीन्द्रनाथ दास, जिन्हें जतिन दास के नाम से भी जाना जाता है, भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के उन क्रांतिकारियों में थे जिन्होंने जेल में राजनीतिक कैदियों के साथ होने वाले व्यवहार के खिलाफ अपना जीवन दांव पर लगा दिया। लाहौर षड्यंत्र मामले में बंदी रहते हुए उन्होंने राजनीतिक कैदियों के अधिकारों और बेहतर जेल परिस्थितियों की मांग को लेकर भूख हड़ताल की। 63 दिनों तक चले इस संघर्ष के बाद 13 सितंबर 1929 को उनकी मृत्यु हो गई। उनकी शहादत ने स्वतंत्रता आंदोलन में गहरा प्रभाव छोड़ा।
प्रारंभिक जीवन और राष्ट्रवादी विचार
जतिन दास का जन्म उस दौर में हुआ जब भारत में औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध राजनीतिक चेतना बढ़ रही थी। युवावस्था में ही वे राष्ट्रवादी गतिविधियों से जुड़े और स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए सक्रिय क्रांतिकारियों के संपर्क में आए। उनके लिए स्वतंत्रता का अर्थ केवल विदेशी शासन का अंत नहीं था; वे जेलों में बंद राजनीतिक कार्यकर्ताओं के साथ सम्मानजनक व्यवहार और बुनियादी अधिकारों की मांग को भी महत्वपूर्ण मानते थे।
लाहौर षड्यंत्र मामला और जेल में भूख हड़ताल
1929 में जतिन दास को लाहौर षड्यंत्र मामले से जुड़े मुकदमे के दौरान जेल में रखा गया। उस समय क्रांतिकारी बंदियों ने जेल में भोजन, वस्त्र, स्वच्छता, पढ़ने-लिखने की सामग्री और राजनीतिक कैदी के रूप में उचित व्यवहार जैसी मांगें उठाईं। उनका विरोध इस बात पर केंद्रित था कि राजनीतिक कारणों से बंद किए गए लोगों के साथ सामान्य आपराधिक बंदियों जैसा व्यवहार करने के बजाय उनकी परिस्थितियों और आवश्यकताओं को ध्यान में रखा जाए।
इन मांगों को लेकर जतिन दास ने भूख हड़ताल शुरू की। यह विरोध लंबा खिंच गया और उनके स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ा। जेल में भूख हड़ताल किसी व्यक्ति के शरीर पर अत्यंत गंभीर प्रभाव डाल सकती है; जतिन दास का संघर्ष औपनिवेशिक जेल व्यवस्था और राजनीतिक बंदियों के अधिकारों पर राष्ट्रीय बहस का विषय बना।

63 दिनों का संघर्ष और शहादत
लगभग 63 दिनों की भूख हड़ताल के बाद 13 सितंबर 1929 को जतिन दास का निधन हो गया। वे उस समय केवल 24 वर्ष के थे। उनकी मृत्यु की खबर ने देशभर में आक्रोश और शोक पैदा किया। उनके पार्थिव शरीर को लाहौर से कलकत्ता ले जाया गया और रास्ते में अनेक स्थानों पर लोगों ने श्रद्धांजलि दी। अंतिम यात्रा में बड़ी संख्या में लोगों की भागीदारी ने दिखाया कि उनकी शहादत ने स्वतंत्रता आंदोलन के समर्थकों को गहराई से प्रभावित किया था।
स्वतंत्रता आंदोलन पर प्रभाव
जतिन दास की शहादत ने राजनीतिक बंदियों की स्थिति और औपनिवेशिक शासन की जेल नीतियों को सार्वजनिक चर्चा के केंद्र में ला दिया। भगत सिंह और उनके साथियों सहित अनेक क्रांतिकारियों के संघर्ष के साथ उनकी भूख हड़ताल भी स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृति में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। उनकी कहानी यह दर्शाती है कि उस समय आंदोलनकारियों ने अदालतों, जेलों और सार्वजनिक मंचों को भी औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध प्रतिरोध के स्थान के रूप में इस्तेमाल किया।
उनका संघर्ष अहिंसक प्रतिरोध के एक विशेष रूप—भूख हड़ताल—का उदाहरण भी है, हालांकि उस दौर के क्रांतिकारी आंदोलन में अलग-अलग विचारधाराएं और संघर्ष के तरीके मौजूद थे। जतिन दास की स्मृति किसी एक रणनीति तक सीमित नहीं, बल्कि राजनीतिक कैदियों की गरिमा और अधिकारों के सवाल से जुड़ी है।
आज जतिन दास को क्यों याद करें?
- नागरिक गरिमा: बंदी बनाए गए व्यक्ति के साथ भी मानवीय और सम्मानजनक व्यवहार होना चाहिए।
- अधिकारों की आवाज: जेल में बंद लोगों की स्थिति और उनके अधिकार सार्वजनिक जवाबदेही का विषय हैं।
- त्याग और प्रतिबद्धता: जतिन दास का जीवन उनके विश्वासों के प्रति दृढ़ता का उदाहरण है।
- इतिहास की जिम्मेदार समझ: उनकी शहादत को याद करते समय ऐतिहासिक तथ्यों, संदर्भ और स्वतंत्रता आंदोलन की विविध धाराओं को समझना जरूरी है।
निष्कर्ष
27 अक्टूबर को जतिन दास की जयंती उनके जीवन और बलिदान को याद करने का अवसर है। 63 दिनों की भूख हड़ताल के बाद हुई उनकी मृत्यु ने राजनीतिक बंदियों के अधिकारों को राष्ट्रीय विमर्श में प्रमुखता दी। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में उनका योगदान हमें याद दिलाता है कि स्वतंत्रता की लड़ाई में मानवीय गरिमा, न्याय और अधिकारों के प्रश्न भी केंद्रीय महत्व रखते थे।

