नई दिल्ली: खेतों में बुवाई और कटाई से लेकर पशुपालन, बीजों के संरक्षण, भोजन तैयार करने, परिवार की देखभाल और स्थानीय आजीविका को संभालने तक ग्रामीण महिलाएं समाज और अर्थव्यवस्था में अनेक भूमिकाएं निभाती हैं। इसके बावजूद उनके श्रम का बड़ा हिस्सा अक्सर औपचारिक पहचान, उचित आय और निर्णय लेने की शक्ति से वंचित रह जाता है। इसी योगदान को पहचान देने और ग्रामीण महिलाओं के अधिकारों तथा अवसरों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए हर साल 15 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय ग्रामीण महिला दिवस (International Day of Rural Women) मनाया जाता है।
कब और क्यों हुई इस दिवस की शुरुआत?
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 18 दिसंबर 2007 को प्रस्ताव 62/136 के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय ग्रामीण महिला दिवस स्थापित किया। पहली बार यह दिवस 15 अक्टूबर 2008 को मनाया गया। इसका उद्देश्य कृषि और ग्रामीण विकास को आगे बढ़ाने, खाद्य सुरक्षा मजबूत करने तथा ग्रामीण गरीबी कम करने में ग्रामीण महिलाओं—जिनमें आदिवासी और स्वदेशी समुदायों की महिलाएं भी शामिल हैं—की महत्वपूर्ण भूमिका को मान्यता देना है।
15 अक्टूबर का चयन विश्व खाद्य दिवस से ठीक एक दिन पहले किया गया, ताकि भोजन के उत्पादन और खाद्य सुरक्षा में महिलाओं के योगदान को विशेष रूप से रेखांकित किया जा सके। यह दिन उत्सव के साथ-साथ उन सामाजिक और आर्थिक बाधाओं पर विचार करने का अवसर भी है, जो महिलाओं की प्रगति को सीमित करती हैं।
खेती से आगे तक है ग्रामीण महिलाओं का योगदान
ग्रामीण महिलाओं का काम केवल खेत में मजदूरी या फसल उगाने तक सीमित नहीं है। वे बीज चुनने और बचाने, निराई-गुड़ाई, कटाई, अनाज छांटने, भंडारण, पशुओं की देखभाल, दूध और अन्य कृषि उत्पादों के प्रबंधन तथा स्थानीय बाजारों तक उत्पाद पहुंचाने में योगदान देती हैं। कई क्षेत्रों में महिलाएं रसोई-बागवानी, मुर्गीपालन, बकरीपालन, दुग्ध उत्पादन और छोटे घरेलू उद्यमों के जरिए परिवार की आय और पोषण को सहारा देती हैं।

उनका योगदान खेत से घर तक फैला हुआ है। भोजन तैयार करना, पानी और ईंधन जुटाना, बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल तथा परिवार के दैनिक कामों को संभालना भी ग्रामीण जीवन को चलाने के लिए जरूरी है। लेकिन इन गतिविधियों का बड़ा हिस्सा अवैतनिक होता है और इसे अक्सर आर्थिक उत्पादन के रूप में पर्याप्त महत्व नहीं मिलता। इस अदृश्य श्रम को पहचानना महिलाओं की वास्तविक भूमिका समझने की पहली शर्त है।
खाद्य सुरक्षा और पोषण में अहम भूमिका
खाद्य सुरक्षा का अर्थ केवल भोजन का उपलब्ध होना नहीं है। लोगों तक पर्याप्त, सुरक्षित और पौष्टिक भोजन की नियमित पहुंच भी उतनी ही जरूरी है। ग्रामीण महिलाएं फसल उत्पादन, पशुपालन, भोजन के चयन और घरेलू संसाधनों के प्रबंधन के जरिए परिवार तथा समुदाय के पोषण को प्रभावित करती हैं। स्थानीय फसलों, पारंपरिक खाद्य पदार्थों और बीजों का ज्ञान भी कृषि विविधता और भोजन प्रणालियों को मजबूत करने में सहायक हो सकता है।
हालांकि, महिलाओं से भोजन और परिवार की देखभाल की जिम्मेदारी निभाने की अपेक्षा की जाती है, लेकिन कई बार उनके पास जमीन, ऋण, कृषि उपकरण, प्रशिक्षण, सिंचाई, बाजार और तकनीक तक समान पहुंच नहीं होती। जब महिलाओं को संसाधनों और निर्णय लेने के अवसरों से वंचित रखा जाता है, तो इसका असर उनकी आय के साथ-साथ परिवार की खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की क्षमता पर भी पड़ सकता है।
ग्रामीण महिलाओं के सामने प्रमुख चुनौतियां
- भूमि और संपत्ति पर सीमित अधिकार: खेती में योगदान देने के बावजूद कई महिलाओं के नाम जमीन या अन्य उत्पादक संपत्तियां नहीं होतीं। इससे ऋण और सरकारी सहायता तक पहुंच प्रभावित हो सकती है।
- आय और काम की असमानता: महिलाओं का कृषि और घरेलू श्रम अक्सर कम आंका जाता है। उन्हें कम मजदूरी, अस्थिर रोजगार और बाजार में कमजोर सौदेबाजी का सामना करना पड़ सकता है।
- शिक्षा और प्रशिक्षण की कमी: गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कृषि विस्तार सेवाओं, डिजिटल कौशल और आधुनिक तकनीक तक पहुंच सभी क्षेत्रों में समान नहीं है।
- समय का दोहरा बोझ: खेती या मजदूरी के साथ पानी लाना, खाना बनाना और परिवार की देखभाल जैसी जिम्मेदारियां महिलाओं के समय और स्वास्थ्य पर अतिरिक्त दबाव डालती हैं।
- जलवायु परिवर्तन का प्रभाव: सूखा, बाढ़, अनियमित वर्षा और गर्मी कृषि उत्पादन तथा पानी की उपलब्धता को प्रभावित करते हैं। संसाधनों तक सीमित पहुंच होने पर महिलाओं के लिए इन बदलावों से निपटना और कठिन हो सकता है।
- निर्णय प्रक्रिया में कम भागीदारी: परिवार, किसान समूहों, सहकारी संस्थाओं और स्थानीय निकायों में महिलाओं की आवाज और नेतृत्व को पर्याप्त स्थान मिलना जरूरी है।
पर्यावरण संरक्षण और जलवायु-सहिष्णु खेती
ग्रामीण महिलाएं बीजों की विविधता बचाने, पानी का सावधानी से उपयोग करने, मिट्टी की देखभाल, स्थानीय खाद्य प्रणालियों और जैव विविधता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। पीढ़ियों से संचित स्थानीय ज्ञान खेती को स्थानीय जलवायु और जरूरतों के अनुरूप बनाने में मदद करता है। आज जब जलवायु परिवर्तन कृषि और ग्रामीण आजीविका पर दबाव बढ़ा रहा है, तब महिलाओं के अनुभव और नेतृत्व को योजनाओं में शामिल करना विशेष रूप से जरूरी है।

संयुक्त राष्ट्र ने 2026 के लिए ग्रामीण महिला किसानों और प्रकृति की देखभाल में उनकी भूमिका को प्रमुखता दी है। यह दृष्टिकोण याद दिलाता है कि पर्यावरण संरक्षण और महिलाओं का आर्थिक सशक्तीकरण अलग-अलग लक्ष्य नहीं हैं। सुरक्षित भूमि अधिकार, प्रशिक्षण, उपयुक्त तकनीक और वित्तीय सहायता महिलाओं को टिकाऊ कृषि पद्धतियां अपनाने और स्थानीय संसाधनों की रक्षा करने में सक्षम बना सकते हैं।
सशक्तीकरण के लिए क्या जरूरी है?
ग्रामीण महिलाओं के जीवन में स्थायी सुधार के लिए केवल प्रशंसा पर्याप्त नहीं है। उन्हें संसाधनों, अवसरों और निर्णय प्रक्रिया में वास्तविक भागीदारी मिलनी चाहिए। इसके लिए कई स्तरों पर कदम जरूरी हैं:
- महिलाओं के भूमि, संपत्ति और विरासत संबंधी अधिकारों की जानकारी और प्रभावी सुरक्षा सुनिश्चित करना।
- कृषि प्रशिक्षण, गुणवत्तापूर्ण बीज, सिंचाई, उपकरण, डिजिटल सेवाओं और बाजार तक पहुंच बढ़ाना।
- स्वयं सहायता समूहों, किसान उत्पादक संगठनों और सहकारी संस्थाओं में महिलाओं के नेतृत्व को प्रोत्साहित करना।
- सस्ती ऋण सुविधा, बीमा, सामाजिक सुरक्षा और उद्यमिता सहायता तक पहुंच आसान बनाना।
- गांवों में शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, स्वच्छ पानी, परिवहन और बाल देखभाल जैसी बुनियादी सुविधाएं मजबूत करना।
- अवैतनिक देखभाल कार्य को सामाजिक और आर्थिक महत्व देना तथा परिवार में जिम्मेदारियों का अधिक समान बंटवारा बढ़ावा देना।
- कृषि और ग्रामीण विकास की योजनाओं के निर्माण तथा मूल्यांकन में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करना।
ग्रामीण महिलाओं की उपलब्धियों को पहचानें
अंतरराष्ट्रीय ग्रामीण महिला दिवस सरकारों, संस्थाओं, मीडिया, बाजारों और समुदायों के लिए यह देखने का अवसर है कि ग्रामीण महिलाएं किन परिस्थितियों में काम कर रही हैं और उन्हें आगे बढ़ने के लिए किन सुविधाओं की जरूरत है। इस दिन किसान महिलाओं के अनुभव सुनना, उनके उत्पादों को उचित बाजार उपलब्ध कराना, स्थानीय महिला समूहों के काम को पहचानना और गांवों में शिक्षा व प्रशिक्षण के अवसरों को बढ़ावा देना उपयोगी कदम हो सकते हैं।
साथ ही, ग्रामीण महिलाओं को केवल सहायता की जरूरत रखने वाले समूह के रूप में नहीं देखना चाहिए। वे किसान, उद्यमी, श्रमिक, ज्ञान-संरक्षक, देखभालकर्ता और समुदाय की नेता हैं। उनकी भागीदारी को मजबूत करना ग्रामीण विकास को अधिक न्यायपूर्ण, टिकाऊ और प्रभावी बनाने में मदद कर सकता है।

समान अवसरों से मजबूत होगा ग्रामीण भविष्य
15 अक्टूबर का संदेश स्पष्ट है: ग्रामीण महिलाओं की मेहनत और ज्ञान को पहचानना खाद्य सुरक्षा, गरीबी उन्मूलन और टिकाऊ विकास के लिए जरूरी है। जब महिलाओं को जमीन, वित्त, तकनीक, शिक्षा और निर्णय लेने के समान अवसर मिलते हैं, तो लाभ केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता—परिवार, समुदाय और स्थानीय अर्थव्यवस्था भी मजबूत हो सकते हैं।
ग्रामीण महिलाओं के योगदान का सम्मान किसी एक दिन तक सीमित नहीं रहना चाहिए। वास्तविक सम्मान तब होगा, जब उनका श्रम दिखाई दे, उनकी आवाज सुनी जाए, उनके अधिकार सुरक्षित हों और उन्हें अपने भविष्य के बारे में निर्णय लेने की स्वतंत्रता मिले। यही अधिक समावेशी ग्रामीण विकास और बेहतर खाद्य सुरक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
