इतिहास विशेष | 12 अक्टूबर 1987 की रात जाफना विश्वविद्यालय में भारतीय शांति सेना का हेलिड्रॉप अभियान आधुनिक भारतीय सैन्य इतिहास की उन घटनाओं में शामिल है, जिसने श्रीलंका में भारत के शांति मिशन की जटिलताओं को उजागर किया। ऑपरेशन पवन के शुरुआती चरण में हुए इस अभियान की कहानी सैन्य रणनीति, खुफिया सूचनाओं, राजनीतिक परिस्थितियों और सैनिकों के बलिदान से जुड़ी है।
श्रीलंका के उत्तरी हिस्से में स्थित जाफना की रात थी। अंधेरे के बीच भारतीय सेना के हेलीकॉप्टर एक ऐसे अभियान के लिए उड़ान भरने वाले थे, जिसका उद्देश्य कुछ ही घंटों में संघर्ष की दिशा बदल देना था। योजना थी कि भारतीय सैनिक अचानक जाफना विश्वविद्यालय परिसर में उतरेंगे, लिट्टे के शीर्ष नेतृत्व को पकड़ेंगे और संगठन की सैन्य गतिविधियों को बड़ा झटका देंगे।
लेकिन जमीन पर परिस्थितियां अनुमान से कहीं अधिक कठिन थीं। जिस अभियान को तेज और निर्णायक कार्रवाई के रूप में तैयार किया गया था, वह भारतीय सैनिकों के लिए भीषण संघर्ष में बदल गया।
यह घटना 11 और 12 अक्टूबर 1987 की रात की है। इसे जाफना विश्वविद्यालय हेलिड्रॉप अभियान के नाम से जाना जाता है। यह भारतीय शांति सेना यानी इंडियन पीस कीपिंग फोर्स (IPKF) के ऑपरेशन पवन के शुरुआती सैन्य अभियानों में शामिल था।

इस अभियान को समझने के लिए उस समय के श्रीलंका के राजनीतिक संकट, तमिल अलगाववादी संघर्ष और भारत की भूमिका को समझना जरूरी है।
श्रीलंका में संघर्ष की पृष्ठभूमि
श्रीलंका में सिंहली बहुसंख्यक आबादी और तमिल अल्पसंख्यक समुदाय के बीच राजनीतिक प्रतिनिधित्व, भाषा, शिक्षा और अधिकारों से जुड़े तनाव लंबे समय से मौजूद थे। समय के साथ इन तनावों ने हिंसक संघर्ष का रूप ले लिया।
तमिल समुदाय के एक हिस्से के बीच अलग तमिल राज्य की मांग को समर्थन मिला। इसी पृष्ठभूमि में लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (LTTE), जिसे आम तौर पर लिट्टे या तमिल टाइगर्स कहा जाता है, एक प्रमुख सशस्त्र संगठन के रूप में उभरा। इसका नेतृत्व वेलुपिल्लई प्रभाकरन कर रहे थे।
1980 के दशक तक श्रीलंका का गृहयुद्ध गंभीर रूप ले चुका था। हिंसा, विस्थापन और मानवीय संकट के बीच भारत भी इस संघर्ष से प्रभावित हो रहा था। तमिलनाडु में श्रीलंकाई तमिलों के मुद्दे को लेकर व्यापक राजनीतिक और सामाजिक चिंता थी।

भारत की तत्कालीन सरकार ने श्रीलंका में राजनीतिक समाधान की कोशिश की। 29 जुलाई 1987 को भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी और श्रीलंका के राष्ट्रपति जे. आर. जयवर्धने के बीच भारत-श्रीलंका समझौते पर हस्ताक्षर हुए। समझौते का उद्देश्य संघर्ष को समाप्त करने, हिंसा कम करने और राजनीतिक समाधान की दिशा में आगे बढ़ने के लिए एक व्यवस्था तैयार करना था।
शांति स्थापना के उद्देश्य से पहुंची भारतीय सेना
समझौते के बाद भारतीय शांति सेना को श्रीलंका भेजा गया। उसकी भूमिका में युद्धविराम और हथियारों के समर्पण की प्रक्रिया में सहायता करना तथा समझौते के अनुरूप शांति स्थापित करने में योगदान देना शामिल था।
लेकिन जमीनी स्थिति जल्द ही जटिल हो गई।
लिट्टे और भारत के बीच समझौते की शर्तों, हथियार डालने और राजनीतिक व्यवस्था को लेकर मतभेद गहराने लगे। लिट्टे ने हथियारों के समर्पण और प्रस्तावित राजनीतिक व्यवस्था को लेकर आपत्तियां जताईं। अक्टूबर 1987 के शुरुआती दिनों में भारतीय सैनिकों और लिट्टे के बीच तनाव बढ़ा और हिंसक घटनाएं सामने आईं।

8 अक्टूबर को भारतीय सैनिकों पर लिट्टे की ओर से मोर्टार और स्वचालित हथियारों से हमले किए जाने की घटनाओं का उल्लेख सैन्य इतिहास के विवरणों में मिलता है। इसके बाद भारत ने लिट्टे को बलपूर्वक निरस्त्र करने की दिशा में कार्रवाई करने का निर्णय लिया।
यहीं से ऑपरेशन पवन का सैन्य चरण शुरू हुआ। इसका प्रमुख उद्देश्य जाफना क्षेत्र में लिट्टे की सैन्य क्षमताओं को कमजोर करना और उसके नियंत्रण वाले महत्वपूर्ण इलाकों पर कब्जा स्थापित करना था।
जाफना विश्वविद्यालय क्यों बना अभियान का केंद्र?
जाफना विश्वविद्यालय परिसर को उस समय लिट्टे के सामरिक मुख्यालय के रूप में इस्तेमाल किए जाने की जानकारी भारतीय सैन्य नेतृत्व के पास थी।
भारतीय खुफिया सूचनाओं के अनुसार, 11 अक्टूबर की रात परिसर में लिट्टे के शीर्ष नेताओं की बैठक होने की संभावना थी। माना गया कि यदि उस समय अचानक कार्रवाई की जाए, तो संगठन के प्रमुख नेताओं को पकड़ा जा सकता है और जाफना पर कब्जे के लिए चल रही सैन्य कार्रवाई को अपेक्षाकृत जल्दी आगे बढ़ाया जा सकता है।

इसी सोच के तहत हेलीकॉप्टर से सैनिकों को परिसर में उतारने की योजना बनाई गई।
इस अभियान में भारतीय सेना के 10 पैरा कमांडो और 13 सिख लाइट इन्फैंट्री के सैनिकों को शामिल किया गया। योजना के अनुसार, पहले कमांडो दल को विश्वविद्यालय परिसर के मैदान में उतारकर लैंडिंग क्षेत्र सुरक्षित करना था। इसके बाद अतिरिक्त सैनिकों को पहुंचाया जाना था। जमीन से आगे बढ़ रही भारतीय सेना की टुकड़ियों को भी हेलिड्रॉप के जरिए उतारे गए सैनिकों से संपर्क स्थापित करना था।
योजना का उद्देश्य था कि सीमित समय में एक अचानक कार्रवाई करके लिट्टे के नेतृत्व को निशाना बनाया जाए।
लेकिन किसी भी सैन्य अभियान में योजना के साथ-साथ खुफिया जानकारी की सटीकता, संचार व्यवस्था, इलाके की वास्तविक परिस्थितियों और विरोधी की प्रतिक्रिया का आकलन भी निर्णायक होता है। जाफना विश्वविद्यालय अभियान में यही पहलू बेहद महत्वपूर्ण साबित हुए।

आधी रात को शुरू हुआ अभियान
11 और 12 अक्टूबर 1987 की रात भारतीय हेलीकॉप्टर सैनिकों को लेकर जाफना विश्वविद्यालय की ओर बढ़े। हेलिड्रॉप के लिए परिसर के फुटबॉल मैदान को प्रमुख लैंडिंग क्षेत्र के रूप में चुना गया था।
लेकिन सैनिकों के उतरने के बाद हालात तेजी से बिगड़ गए। भारतीय सैनिकों को अपेक्षित स्तर से कहीं अधिक सशस्त्र प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। लिट्टे के लड़ाके इलाके की भौगोलिक स्थिति से परिचित थे और उन्होंने भारतीय सैनिकों पर भारी गोलीबारी की।
भारतीय वायुसेना के Mi-8 हेलीकॉप्टरों को भी गोलीबारी से नुकसान पहुंचा। इससे सैनिकों की अगली खेप को सुरक्षित रूप से उतारने की योजना प्रभावित हुई।
अभियान के विवरणों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि लिट्टे ने भारतीय सैन्य संचार को सुनकर या उससे संबंधित सूचनाएं हासिल करके अपनी तैयारी की थी। हालांकि, संचार संबंधी घटनाओं का सटीक विवरण अलग-अलग सैन्य वृत्तांतों में भिन्न हो सकता है।

इस बीच, भारतीय सैनिक विश्वविद्यालय परिसर और उसके आसपास के इलाके में संघर्ष कर रहे थे। अंधेरा, सीमित दृश्यता, संकरी गलियां और लैंडिंग क्षेत्र तक पहुंचने में कठिनाइयां स्थिति को और चुनौतीपूर्ण बना रही थीं।
जिस अभियान में तेजी और आश्चर्य को सबसे महत्वपूर्ण माना गया था, उसी अभियान में सैनिकों को अप्रत्याशित प्रतिरोध के बीच अपनी स्थिति संभालनी पड़ी।
सैन्य योजना और खुफिया आकलन पर उठे सवाल
जाफना विश्वविद्यालय अभियान का विश्लेषण करते समय कई सैन्य पहलुओं पर ध्यान देना जरूरी है।
पहला, खुफिया सूचना के आधार पर यह अनुमान लगाया गया था कि लिट्टे का शीर्ष नेतृत्व विश्वविद्यालय परिसर में मौजूद होगा। लेकिन किसी संभावित बैठक की सूचना और वास्तविक समय में लक्ष्य की मौजूदगी की पुष्टि के बीच अंतर होता है।

दूसरा, हेलीकॉप्टरों की संख्या, लैंडिंग क्षेत्र की सीमाएं और सैनिकों को चरणबद्ध तरीके से उतारने की योजना ने अभियान की गति को प्रभावित किया।
तीसरा, जाफना के शहरी इलाके में लिट्टे की स्थिति, उसके लड़ाकों की स्थानीय जानकारी और मजबूत प्रतिरोध की क्षमता का पर्याप्त आकलन हुआ या नहीं, यह बाद के सैन्य विश्लेषणों में महत्वपूर्ण प्रश्न बना।
भारतीय सैन्य इतिहास से संबंधित विवरणों में अभियान की योजना और क्रियान्वयन की कई कमियों का उल्लेख किया गया है। विशेष रूप से लैंडिंग क्षेत्र, हेलीकॉप्टरों की उपलब्धता, संचार और जमीनी सैनिकों से संपर्क स्थापित करने की कठिनाइयों को महत्वपूर्ण माना गया है।
हालांकि, इस अभियान को केवल एक सामरिक विफलता के रूप में देखकर पूरे श्रीलंका मिशन का आकलन करना भी उचित नहीं होगा। इसके लिए व्यापक राजनीतिक और सैन्य संदर्भ को समझना जरूरी है।

फिर भी, यह घटना इस बात का उदाहरण बनी कि जटिल शहरी परिस्थितियों में किसी अचानक हवाई अभियान की सफलता केवल शुरुआती योजना पर नहीं, बल्कि बदलते हालात में निर्णय लेने, संचार और विभिन्न सैन्य इकाइयों के समन्वय पर भी निर्भर करती है।
भारतीय सैनिकों का नुकसान और अभियान का परिणाम
जाफना विश्वविद्यालय अभियान में भारतीय सैनिकों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। उपलब्ध सैन्य विवरणों में 10 पैरा कमांडो के छह सैनिकों और 13 सिख लाइट इन्फैंट्री की टुकड़ी के लगभग 29 सैनिकों की मौत का उल्लेख मिलता है। अलग-अलग विवरणों में सैनिकों की संख्या और हताहतों के कुछ आंकड़ों में अंतर पाया जाता है।
इन आंकड़ों के पीछे उन सैनिकों और उनके परिवारों की वास्तविक मानवीय पीड़ा थी, जिन्होंने इस अभियान की कीमत चुकाई।
अभियान का प्रमुख उद्देश्य—लिट्टे के शीर्ष नेतृत्व को विश्वविद्यालय परिसर में पकड़ना—पूरा नहीं हुआ। इसके बावजूद भारतीय सेना ने जाफना क्षेत्र में ऑपरेशन पवन के अंतर्गत अपनी कार्रवाई जारी रखी।

आगे चलकर भारतीय सेना ने जाफना पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए व्यापक अभियान चलाया। इस दौरान उसे शहरी युद्ध, बारूदी सुरंगों, घात लगाकर किए गए हमलों और स्थानीय परिस्थितियों से जुड़ी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। जाफना विश्वविद्यालय अभियान इसी व्यापक संघर्ष का शुरुआती और अत्यंत कठिन हिस्सा था।
इस घटना से यह भी स्पष्ट हुआ कि शांति स्थापना के उद्देश्य से किसी क्षेत्र में पहुंची सेना को परिस्थितियों के बदलने पर सीधे सैन्य संघर्ष का सामना करना पड़ सकता है।
ऑपरेशन पवन: शांति मिशन से लंबे सैन्य संघर्ष तक
ऑपरेशन पवन केवल एक रात का अभियान नहीं था। यह श्रीलंका में भारत की व्यापक सैन्य भागीदारी का हिस्सा था, जो 1987 से 1990 तक जारी रही।
भारतीय शांति सेना को ऐसे संघर्ष में काम करना पड़ा, जिसमें राजनीतिक समझौते, जातीय तनाव, स्थानीय समर्थन और सशस्त्र संगठनों के हित एक-दूसरे से जुड़े हुए थे।

भारत-श्रीलंका समझौते के शुरुआती उद्देश्यों और बाद में विकसित हुई सैन्य परिस्थितियों के बीच स्पष्ट अंतर दिखाई देने लगा। लिट्टे के साथ भारतीय सेना का संघर्ष बढ़ा और मिशन की प्रकृति बदलती चली गई।
इस अनुभव ने भारत की विदेश नीति और सैन्य रणनीति के सामने कई प्रश्न खड़े किए। किसी पड़ोसी देश के आंतरिक संघर्ष में हस्तक्षेप करते समय राजनीतिक समाधान और सैन्य कार्रवाई के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए? शांति समझौते के क्रियान्वयन में विभिन्न पक्षों की सहमति कितनी आवश्यक है? और जब समझौते के प्रमुख पक्ष ही एक-दूसरे से संघर्ष करने लगें, तो शांति सेना की भूमिका कैसे निर्धारित की जाए?
इन सवालों का महत्व केवल 1987 तक सीमित नहीं है। वे अंतरराष्ट्रीय शांति अभियानों और संघर्ष समाधान के व्यापक अध्ययन में भी प्रासंगिक हैं।
जाफना विश्वविद्यालय अभियान से मिलने वाले सबक
इस घटना को याद करने का उद्देश्य केवल सैनिकों की कार्रवाई या सैन्य योजना की समीक्षा करना नहीं है। इसका महत्व इस बात में भी है कि यह राजनीतिक समझौतों, खुफिया आकलन और सैन्य निर्णयों के आपसी संबंध को स्पष्ट करती है।

पहला सबक यह है कि किसी भी अभियान में खुफिया सूचना की पुष्टि और उसकी सीमाओं का आकलन अत्यंत महत्वपूर्ण है।
दूसरा, किसी इलाके की भौगोलिक स्थिति और स्थानीय परिस्थितियों को समझे बिना तैयार की गई योजना गंभीर जोखिम पैदा कर सकती है।
तीसरा, राजनीतिक उद्देश्य और सैन्य कार्रवाई के बीच स्पष्ट समन्वय आवश्यक है। यदि शांति समझौते की शर्तों पर सहमति टूटने लगे, तो सैन्य कार्रवाई के उद्देश्यों और संभावित परिणामों की समीक्षा जरूरी हो जाती है।
चौथा, किसी सैन्य अभियान के मूल्यांकन में उसके परिणामों के साथ सैनिकों की सुरक्षा, नागरिकों पर प्रभाव और दीर्घकालीन राजनीतिक परिणामों को भी ध्यान में रखना चाहिए।

जाफना विश्वविद्यालय अभियान इन सभी पहलुओं पर विचार करने का अवसर देता है।
इतिहास में दर्ज एक कठिन अध्याय
12 अक्टूबर 1987 की रात जाफना विश्वविद्यालय में हुआ अभियान भारतीय सैन्य इतिहास की उन घटनाओं में से है, जिनमें सैनिकों के साहस के साथ-साथ रणनीतिक और खुफिया चुनौतियों को भी याद करना आवश्यक है।
यह अभियान अपने तत्कालीन उद्देश्य को हासिल नहीं कर सका और भारतीय सैनिकों को गंभीर क्षति उठानी पड़ी। इसकी पृष्ठभूमि में भारत-श्रीलंका समझौते की जटिलताएं, लिट्टे के साथ बिगड़ते संबंध और जाफना क्षेत्र की कठिन सैन्य परिस्थितियां थीं।
आज इस घटना को याद करते समय जरूरी है कि इतिहास को केवल जीत और हार के दो खानों में न बांटा जाए। इसके बजाय उन परिस्थितियों को समझा जाए, जिनमें फैसले लिए गए, उन फैसलों के परिणामों का आकलन किया जाए और संघर्ष में जान गंवाने वाले लोगों को सम्मानपूर्वक याद किया जाए।

जाफना विश्वविद्यालय अभियान की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक सीख यह है कि शांति स्थापित करने का उद्देश्य अपने आप में पर्याप्त नहीं होता। उसके लिए राजनीतिक सहमति, विश्वसनीय जानकारी, स्पष्ट रणनीति और बदलती परिस्थितियों के अनुरूप निर्णय लेने की क्षमता भी उतनी ही आवश्यक है।
श्रीलंका में भारतीय शांति सेना का अनुभव इसी जटिल वास्तविकता की याद दिलाता है—जहां शांति की उम्मीद लेकर शुरू हुआ मिशन अंततः एक कठिन और लंबे सैन्य संघर्ष में बदल गया।
