“नमस्कार, यह आकाशवाणी का पंचरंगी कार्यक्रम विविध भारती है…”
यह महज़ एक उद्घोषणा नहीं है, बल्कि करोड़ों भारतीयों के लिए यादों का एक ऐसा टाइम-मशीन है, जो खुलते ही हमें उस दौर में ले जाता है जहाँ रसोई से आती माँ के हाथ की चाय की खुशबू थी, आँगन में बिखरी गुनगुनी धूप थी और ट्रांजिस्टर से छनकर आती एक बेहद सुरीली आवाज थी।
एक ऐसी आवाज जो किसी के लिए सुबह की शुरुआत थी, किसी के लिए दोपहर का साथी और किसी के लिए रात की आखिरी याद।
किसी ने उसके साथ अपना बचपन जीया, किसी ने पहली मोहब्बत महसूस की, किसी ने नौकरी की थकान उतारी और किसी जवान ने सीमा पर बैठे-बैठे अपने घर की दूरी कुछ कम महसूस की।
यह सिर्फ कोई रेडियो स्टेशन नहीं था।
यह विविध भारती थी।
एक ऐसा नाम, जिसे सुनते ही एक पूरी पीढ़ी के सामने सिर्फ गाने नहीं, बल्कि चेहरे, घर, गलियां, रिश्ते और बीता हुआ समय घूमने लगता है।
3 अक्टूबर को भारतीय रेडियो इतिहास का सबसे खूबसूरत पन्ना यानी विविध भारती अपने गौरवमयी 69 साल पूरे करने जा रहा है।
एक ऐतिहासिक शुरुआत जो बन गई ‘देश की धड़कन’
साल 1957 में जब रेडियो सीलोन पर फिल्मी गानों का क्रेज भारतीय श्रोताओं के सिर चढ़कर बोल रहा था, तब देश के अपने रेडियो की जरूरत महसूस हुई। तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्रालय के परामर्श से पंडित नरेंद्र शर्मा ने एक ऐसी सेवा की रूपरेखा तैयार की, जो विशुद्ध रूप से भारतीय हो।
3 अक्टूबर 1957 को सुबह 10 बजकर 13 मिनट पर मन्ना डे के गाए मधुर गीत ‘नाच रे मयूरा’ के साथ विविध भारती का जन्म हुआ।
देखते ही देखते यह सेवा सिर्फ एक रेडियो स्टेशन नहीं, बल्कि हर घर का एक सदस्य बन गई।
विविध भारती का मतलब सिर्फ गाने नहीं था
आज गाना सुनना हो तो मोबाइल उठाइए, नाम लिखिए और कुछ सेकंड में गीत सामने।
लेकिन विविध भारती के जमाने में किसी पसंदीदा गीत का इंतजार भी एक अनुभव था।
किस कार्यक्रम में आएगा?
कितने बजे आएगा?
आज सुन पाएंगे या नहीं?
और अगर गीत छूट गया तो?
यही इंतजार गीत को याद बना देता था।
विविध भारती ने इसी इंतजार को अपनी ताकत बनाया। उसने श्रोताओं को सिर्फ संगीत नहीं दिया, एक तय समय दिया—जिसका इंतजार किया जा सके।
वो कार्यक्रम जो हमारी जिंदगी का हिस्सा बन गए
‘संगीत सरिता’: जब गीत सुनने के साथ संगीत समझ में भी आता था
सुबह का एक अपना संसार था—‘संगीत सरिता’।
यह सिर्फ मनोरंजन नहीं, भारतीय संगीत की दुनिया से परिचय कराने वाला कार्यक्रम भी था। विविध भारती के आधिकारिक अभिलेखों में इस कार्यक्रम से जुड़े बड़े नामों में गिरिजा देवी, पंडित शिवकुमार शर्मा, पंडित हरिप्रसाद चौरसिया, पंडित जसराज, पंडित राम नारायण, राजन मिश्रा और साजन मिश्रा जैसे दिग्गज कलाकार शामिल हैं।
सोचिए, सुबह घर में काम करती मां, दुकान खोलता पिता या पढ़ाई के लिए उठता कोई बच्चा—और पीछे से भारतीय संगीत की सुरमयी दुनिया।
विविध भारती घर में बजती जरूर थी, लेकिन धीरे-धीरे घर की आदत बन गई।
‘हवा महल’: आवाजों से आंखों के सामने बनता था पूरा संसार
फिर आता था ‘हवा महल’।
यह विविध भारती की उन पहचान वाली प्रस्तुतियों में रहा, जिसने बिना तस्वीर के भी श्रोताओं के सामने पूरा दृश्य खड़ा कर दिया।
आवाज बदलती, संवाद आते, कहानी आगे बढ़ती और सुनने वाला अपने मन में पात्रों के चेहरे बना लेता।
आज हम स्क्रीन पर कहानी देखते हैं।
तब हवा महल सुनते हुए कहानी अपने मन में देखते थे।
शायद इसी वजह से उस पीढ़ी की कल्पना इतनी समृद्ध थी। उन्हें मनोरंजन तैयार करके नहीं मिलता था, वे मनोरंजन को अपने भीतर रचते थे। आवाजों से दृश्य बनते थे, गीतों से कहानियां निकलती थीं और कहानियों से सपनों की अपनी दुनिया तैयार होती थी—एक ऐसी दुनिया, जो हर व्यक्ति के भीतर थी जीससे कुछ पल के लिए बाहर की दुनिया थम जाती थी और वे अपनी ही बनाई उस खूबसूरत दुनिया में खो जाते थे
और शायद इसीलिए आज भी ‘हवा महल’ की कोई पुरानी आवाज कानों में पड़ती है, तो वे सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं सुनते… वे कुछ पल के लिए फिर उसी दुनिया में चले जाते हैं, जो कभी किसी स्क्रीन ने नहीं,उन्होंने खुद अपने भीतर रचा था।
‘छायागीत’ और ‘आप की फरमाइश’: जब पसंद का गीत निजी खुशी बन जाता था
फिर था ‘छायागीत’।
गीतों के साथ भावनाओं का ऐसा संसार, जहां सुनने वाला अपने मन की कहानी भी जोड़ देता था।
और ‘आप की फरमाइश’—नाम ही बताता था कि यहां श्रोता की पसंद की अपनी जगह थी।
किसी को अपना पसंदीदा गीत सुनना था।
किसी को किसी अपने के नाम गीत समर्पित करना था।
कभी किसी का नाम रेडियो पर सुनाई देता तो वह क्षण घर के लिए किसी छोटे उत्सव से कम नहीं होता था।
आज सोशल मीडिया पर किसी पोस्ट पर लाइक आना सामान्य है। तब रेडियो पर अपना नाम सुन लेना यादगार घटना हुआ करती थी।
‘जैमाला’: जब विविध भारती ने घर और सीमा के बीच पुल बनाया
विविध भारती की पहचान में ‘जैमाला’ का स्थान अलग रहा है।
यह कार्यक्रम लंबे समय तक सैनिकों के लिए खास जुड़ाव का माध्यम रहा। विशेष ‘जैमाला’ में फिल्म और संगीत जगत की हस्तियां भी शामिल होती रही हैं। आज भी विविध भारती की आधिकारिक कार्यक्रम सूची में ‘स्पेशल जैमाला’ दर्ज है।
सीमा पर बैठा जवान जब कोई जाना-पहचाना गीत सुनता होगा, तो शायद उसे सिर्फ संगीत नहीं सुनाई देता होगा।
उसे अपना घर सुनाई देता होगा।
मां की आवाज।
पत्नी की हंसी।
बच्चे की किलकारी।
और वह देश, जिसके लिए वह घर से दूर था।
यही विविध भारती को बाकी मनोरंजन कार्यक्रमों से अलग बनाता है—उसके गीतों के बीच रिश्ते सांस लेते थे।
आवाजें भी सितारे बन गई थीं
विविध भारती के दौर में सिर्फ कलाकार प्रसिद्ध नहीं होते थे।
उद्घोषकों की आवाजें भी पहचान बन जाती थीं।
लोग उन्हें देखते नहीं थे, लेकिन पहचानते थे।
आवाज सुनते ही पता चल जाता था कि कौन-सा कार्यक्रम शुरू हो गया।
रेडियो उद्घोषणा की दुनिया के सबसे मशहूर नामों में अमीन सयानी का नाम जरूर आता है।
उनकी आवाज में सिर्फ मिठास नहीं थी, उसमें एक ऐसा अपनापन था जैसे कोई दूर बैठा अपना ही इंसान आपसे बात कर रहा हो। उनकी पहचान बिनाका गीतमाला से बनी, जो पहले रेडियो सीलोन पर प्रसारित हुई और बाद में विविध भारती पर भी पहुंची।
अमीन सयानी ने बाद के वर्षों में विविध भारती के लिए भी कई कार्यक्रम किए और उनकी आवाज करोड़ों श्रोताओं तक पहुंचती रही।लेकिन अमीन सयानी को सिर्फ एक लोकप्रिय उद्घोषक कह देना शायद उनके असर को छोटा कर देना होगा। वह आवाज और श्रोता के बीच की वह डोर थे, जिसमें अनजान लोग भी अपना-सा रिश्ता महसूस करते थे।
उस दौर की दूसरी यादगार आवाजें
छाया गांगुली — संगीत सरिता से जुड़ा उनका नाम उस दौर की उन आवाजों में आता है जिन्होंने शास्त्रीय संगीत को सहज ढंग से श्रोताओं तक पहुंचाने में भूमिका निभाई। 1980 के दशक में उन्होंने कार्यक्रम को नए विषयों के साथ आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
कमल शर्मा — उनकी आवाज विविध भारती की प्रस्तुति की उस परंपरा की याद दिलाती है, जहां उद्घोषक केवल कार्यक्रम की घोषणा नहीं करता था, बल्कि श्रोता को कार्यक्रम के मूड में लेकर जाता था।
राजेंद्र त्रिपाठी — विविध भारती की बाद की पीढ़ियों में पहचानी जाने वाली आवाजों में उनका नाम भी आता है। आज भी विविध भारती की प्रसारण सूची से जुड़े स्रोतों में उनका नाम उद्घोषक/आरजे के रूप में मिलता है।
और यही विविध भारती की खूबसूरती थी—आवाजें आती-जाती रहीं, कार्यक्रम बदलते रहे, माध्यम बदलते रहे, लेकिन श्रोता और उस आवाज के बीच बना अपनापन नहीं बदला।
‘पिटारा’ से ‘इनसे मिलिए’ तक—विविध भारती बदलती रही
वक्त बदला तो विविध भारती भी बदली।
सिर्फ पुराने फिल्मी गीतों तक सीमित रहने के बजाय कार्यक्रमों की दुनिया और बड़ी हुई।
‘इनसे मिलिए’, ‘आज के मेहमान’, ‘सर्गम के सितारे’, ‘उजाले उनकी यादों के’, ‘पिटारा’ जैसे कार्यक्रमों ने कलाकारों, संगीतकारों, लेखकों और फिल्मी दुनिया से जुड़े लोगों को श्रोताओं के और करीब लाया। प्रसार भारती की मौजूदा सूची में इन कार्यक्रमों और उनसे जुड़े अनेक कलाकारों के नाम दर्ज हैं।
यानी विविध भारती ने समय के साथ खुद को बदला, लेकिन अपना मूल स्वभाव नहीं छोड़ा—
श्रोता से बातचीत।
फिर जमाना बदला… लेकिन विविध भारती पीछे नहीं छूटी
टेलीविजन आया।
फिर केबल टीवी।
फिर एफएम।
फिर इंटरनेट।
फिर यूट्यूब और म्यूजिक ऐप।
हर बार लगा कि अब शायद विविध भारती का समय खत्म हो जाएगा।
लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
विविध भारती ने भी अपना रास्ता बदला।
आज यह केवल पुराने रेडियो सेट तक सीमित नहीं है। प्रसार भारती के अनुसार विविध भारती की सेवा वेबस्ट्रीमिंग के जरिए भी उपलब्ध है और यह देशभर में बड़ी आबादी तक पहुंचने वाले उसके प्रमुख मनोरंजन नेटवर्क का हिस्सा है।
यानी कभी जिसे सुनने के लिए घर में एक खास जगह पर रेडियो रखना पड़ता था, आज वही विविध भारती मोबाइल और डिजिटल माध्यमों से भी सुनी जा सकती है।
माध्यम बदल गया, विविध भारती की आवाज नहीं।
69 साल बाद भी क्यों याद आती है विविध भारती?
क्योंकि कुछ चीजें मनोरंजन से आगे निकल जाती हैं।
वे स्मृति बन जाती हैं।
विविध भारती ऐसी ही स्मृति है।
किसी बुजुर्ग के लिए यह बचपन है।
किसी मां के लिए मायके की याद।
किसी पिता के लिए नौकरी के दिनों की थकान के बाद की शाम।
किसी प्रेमी के लिए वह गीत, जिसे सुनकर किसी का चेहरा याद आता है।
किसी सैनिक के लिए घर से हजारों किलोमीटर दूर अपनेपन की आवाज।
और किसी आज के युवा के लिए शायद अपने माता-पिता की वह दुनिया, जिसे उसने कभी देखा नहीं, लेकिन उनके किस्सों में सुना है।
यही वजह है कि विविध भारती की कहानी केवल 1957 से 2026 तक की प्रसारण यात्रा नहीं है।
यह उन पीढ़ियों की कहानी है, जिन्होंने इसके साथ अपनी जिंदगी के छोटे-बड़े अध्याय लिखे।
कितने ही घर चले गए।
कितने आंगन बदल गए।
कितने चेहरे तस्वीरों में रह गए।
कितने गीत पुराने हो गए।
लेकिन कहीं न कहीं, किसी सुबह, किसी दोपहर या किसी रात—
विविध भारती की आवाज फिर सुनाई देती
और उम्र अचानक कुछ साल पीछे चली जाती है।
आंखों के सामने वही पुराना घर आ जाता है।
दरवाजे पर बैठा पिता।
रसोई में मां।
स्कूल जाता बच्चा।
खेत की ओर जाता किसान।
और कोने में बजती वह आवाज—
“विविध भारती…”
शायद यही उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है।
उसने लोगों को सिर्फ यह नहीं बताया कि आज कौन-सा गीत बज रहा है।
उसने अनगिनत लोगों को यह याद दिलाया कि
उनकी जिंदगी में कभी कौन-सा गीत बजा था।
और इसीलिए 3 अक्टूबर सिर्फ विविध भारती का स्थापना दिवस नहीं—यह उन यादों का दिन है, जिन्हें समय भी पूरी तरह पुराना नहीं कर पाया।