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सुरों की रानी, भक्ति की साधिका: एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी की जिंदगी के वो अनसुने किस्से, जो उन्हें सबसे अलग बनाते हैं

आभा शुक्ला
Last updated: सितम्बर 17, 2026 9:30 अपराह्न
By : आभा शुक्ला
Published on : 2 महीना पहले
MS Subbulakshmi 110th Jayanti पर महान गायिका एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी की तस्वीर
MS Subbulakshmi 110th Jayanti पर महान गायिका एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी की तस्वीर
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जन्मदिवस विशेष | 110वीं जयंती |MS Subbulakshmi 110th Jayanti|

सुरों की रानी, भक्ति की साधिका को याद करने का दिन

16 सितंबर 1916 को मदुरै में जन्मीं एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी की आज 110वीं जयंती है। 11 दिसंबर 2004 को 88 वर्ष की उम्र में दुनिया को अलविदा कहने वाली इस महान गायिका की आवाज आज भी मंदिरों की प्रार्थनाओं, संगीत प्रेमियों की सुबह और करोड़ों लोगों की यादों में गूंजती है।

उनकी जिंदगी सिर्फ एक महान गायिका की कहानी नहीं है। मदुरै से शुरू हुआ उनका सुरों का सफर देश के बड़े मंचों से होता हुआ संयुक्त राष्ट्र तक पहुंचा। उनके लिए संगीत केवल कला नहीं, बल्कि ईश्वर तक पहुंचने का रास्ता और समाज की सेवा का माध्यम था।

उनकी 110वीं जयंती के मौके पर आइए जानते हैं एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी की जिंदगी से जुड़े उन अनसुने किस्सों को, जो उन्हें सिर्फ ‘सुरों की रानी’ नहीं, बल्कि ‘भक्ति की साधिका’ भी बनाते हैं।

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भारतीय शास्त्रीय संगीत के इतिहास में कुछ आवाजें ऐसी होती हैं, जिन्हें सुनना सिर्फ संगीत सुनना नहीं होता, बल्कि एक आध्यात्मिक अनुभव जैसा लगता है। एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी भी ऐसी ही आवाज थीं। उनकी गायकी में शास्त्रीय संगीत की गहराई थी तो भक्ति की ऐसी मिठास भी, जो सीधे मन को छू जाती थी।

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मदुरै से शुरू हुआ सुरों का सफर

एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी का जन्म 16 सितंबर 1916 को मदुरै में हुआ था। उनकी मां षण्मुखवडिवु एक कुशल वीणा वादक थीं। घर में संगीत का माहौल था और इसी वातावरण में सुब्बुलक्ष्मी की आवाज ने बचपन से ही आकार लेना शुरू कर दिया।

बहुत छोटी उम्र में उन्होंने मंच पर गाना शुरू कर दिया था। उनकी प्रतिभा को जल्दी ही पहचान मिल गई और आगे चलकर वे कर्नाटक संगीत की सबसे प्रतिष्ठित आवाजों में शामिल हुईं।

लेकिन उनकी खासियत केवल उनकी आवाज नहीं थी। उनके गायन में ऐसी भक्ति और भावनात्मक गहराई थी कि भाषा न समझने वाला व्यक्ति भी उस संगीत से जुड़ जाता था।

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जब मीरा बनीं तो किरदार से आगे निकल गईं

एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी के जीवन की सबसे चर्चित घटनाओं में उनकी फिल्म ‘मीरा’ भी शामिल है। 1945 में बनी इस फिल्म में उन्होंने संत मीरा की भूमिका निभाई। बाद में इसका हिंदी संस्करण भी आया और उनकी आवाज देश के दूसरे हिस्सों तक पहुंची।

मीरा का किरदार निभाते हुए वह सिर्फ अभिनय नहीं कर रही थीं, बल्कि कृष्ण भक्ति में पूरी तरह डूब जाती थीं। परिवार से जुड़ी एक स्मृति के मुताबिक, फिल्म के अंतिम दृश्य में मीरा के कृष्ण में विलीन होने वाले प्रसंग को निभाते समय वह इतनी भावुक हो गई थीं कि बेहोश हो गईं। इस घटना का स्वतंत्र दस्तावेजी प्रमाण सीमित है, इसलिए इसे उनके परिवार से जुड़ी स्मृति के तौर पर ही देखा जाता है। लेकिन यह किस्सा उनकी भक्ति और कला के बीच के उस रिश्ते को जरूर दिखाता है, जो उनकी गायकी की सबसे बड़ी पहचान बना।

बालाजी के सुप्रभातम से घर-घर पहुंची आवाज

एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी की आवाज को घर-घर पहुंचाने में श्री वेंकटेश्वर सुप्रभातम की रिकॉर्डिंग की बड़ी भूमिका रही। आज भी तिरुमला मंदिर की सुबह की धार्मिक परंपरा से उनका स्वर गहराई से जुड़ा हुआ है।

इसके अलावा विष्णु सहस्रनामम्, भज गोविंदम् और अन्य भक्ति रचनाओं की उनकी रिकॉर्डिंग ने उन्हें केवल कर्नाटक संगीत के श्रोताओं तक सीमित नहीं रखा।

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दिलचस्प बात यह है कि संगीत से मिली कमाई को उन्होंने केवल अपने लिए नहीं रखा। उन्होंने कई धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं के लिए कार्यक्रम किए और अपनी रिकॉर्डिंग से मिलने वाली रॉयल्टी भी विभिन्न सेवा कार्यों के लिए दी। सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक उन्होंने 200 से अधिक चैरिटी कॉन्सर्ट किए थे।

गांधी के अनुरोध पर गाया ‘हरि तुम हरो’

महात्मा गांधी भी उनकी आवाज से प्रभावित थे। गांधीजी के अनुरोध पर एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी ने ‘हरि तुम हरो जन की पीर’ भजन गाया। यह भजन बाद में उनकी सबसे यादगार प्रस्तुतियों में शामिल हुआ।

उनकी आवाज में भक्ति का जो भाव था, उसने उन्हें देश के कई बड़े नेताओं और सार्वजनिक व्यक्तित्वों के बीच भी विशेष सम्मान दिलाया। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भी उनकी प्रतिभा की प्रशंसा की थी।

एपीजे अब्दुल कलाम भी थे उनकी आवाज के मुरीद

भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम भी एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी की गायकी के बड़े प्रशंसक थे। कलाम ने खुद बताया था कि उन्होंने पहली बार उन्हें 1950 में त्यागराज उत्सव में सुना था और वह उनके आजीवन प्रशंसक बन गए।

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1998 में जब एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी को भारत रत्न से सम्मानित किया गया, तब डॉ. कलाम भी उस समारोह से जुड़े थे। उन्होंने बाद में उनके साथ हुई मुलाकात और उनसे मिले आशीर्वाद को अपने लिए खास क्षण के तौर पर याद किया।

सुब्बुलक्ष्मी के निधन के बाद भी कलाम ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए उनके संगीत और व्यक्तित्व को याद किया। यह सिर्फ एक महान कलाकार के प्रति सम्मान नहीं था, बल्कि उस प्रभाव की झलक भी थी, जो उनकी आवाज ने अलग-अलग पीढ़ियों पर छोड़ा।

कांची ‘महापेरियवा’ से था गहरा आध्यात्मिक जुड़ाव

एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी की जिंदगी में संगीत और अध्यात्म एक-दूसरे से अलग नहीं थे। उनका कांची कामकोटि पीठ के परमाचार्य श्री चंद्रशेखरेन्द्र सरस्वती से भी गहरा आध्यात्मिक जुड़ाव माना जाता है। श्रद्धालु उन्हें सम्मान से ‘महापेरियवा’ कहते थे।

‘महापेरियवा’ तमिल परंपरा में किसी अत्यंत पूजनीय और महान बुजुर्ग संत के लिए सम्मान का संबोधन है। सुब्बुलक्ष्मी के जीवन में महापेरियवा का स्थान बेहद खास था।

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उनकी आध्यात्मिक साधना और महापेरियवा से जुड़े प्रसंगों का जिक्र कई संस्मरणों में मिलता है। कहा जाता है कि संगीत को लेकर उनका भरोसा सिर्फ अपनी आवाज पर नहीं, बल्कि ईश्वर की कृपा पर भी था। यही भाव उनकी प्रस्तुतियों में सुनाई देता था।

उनकी प्रसिद्ध रचना ‘मैत्रीं भजत’ भी इसी आध्यात्मिक परंपरा से जुड़ी मानी जाती है। इसका संदेश था—दुनिया में प्रेम, मित्रता, शांति और मानवता बनी रहे।

संयुक्त राष्ट्र में जब गूंजा भारतीय संगीत

1966 में एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रस्तुति दी। यह भारतीय संगीत के लिए ऐतिहासिक क्षण था।

उन्होंने वहां ‘मैत्रीं भजत’ सहित अपनी प्रस्तुतियों से भारतीय संगीत और भारतीय आध्यात्मिक विचार को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया। उनकी आवाज में सिर्फ संगीत नहीं था, बल्कि शांति और मानवता का संदेश भी था।

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इसके बाद दुनिया के कई प्रतिष्ठित मंचों पर उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया। एडिनबर्ग इंटरनेशनल फेस्टिवल और रॉयल अल्बर्ट हॉल जैसे मंचों पर उनकी प्रस्तुतियां हुईं। ब्रिटिश राजपरिवार और दुनिया के कई बड़े लोगों ने भी उनकी गायकी सुनी।

संगीत, भक्ति और सेवा—तीनों एक साथ

सुब्बुलक्ष्मी की खासियत सिर्फ उनकी आवाज नहीं थी। उनकी जिंदगी में संगीत, अध्यात्म और सेवा तीनों एक साथ चलते थे।

उन्होंने चैरिटी के लिए लगातार कार्यक्रम किए। कई संस्थाओं को आर्थिक मदद पहुंचाई। उनके लिए संगीत सिर्फ करियर नहीं था। वह इसे एक ऐसी साधना मानती थीं, जिसके जरिए समाज और जरूरतमंदों की मदद की जा सकती है।

शायद यही वजह है कि उन्हें सुनने वाले लोग सिर्फ उनकी तकनीकी गायकी की बात नहीं करते, बल्कि उनके संगीत से मिलने वाले भावनात्मक और आध्यात्मिक अनुभव को भी याद करते हैं।

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पुरस्कारों से सजा लंबा सफर

एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी को उनके योगदान के लिए देश-दुनिया के कई बड़े सम्मान मिले।

प्रमुख सम्मान—

  • 1954: पद्म भूषण
  • 1956: संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार
  • 1968: संगीत कलानिधि — यह सम्मान पाने वाली पहली महिला
  • 1974: रेमन मैग्सेसे पुरस्कार
  • 1975: पद्म विभूषण
  • 1988: कालिदास सम्मान
  • 1990: इंदिरा गांधी राष्ट्रीय एकता पुरस्कार
  • 1998: भारत रत्न

1998 में भारत रत्न मिलने के साथ वह इस सर्वोच्च नागरिक सम्मान से सम्मानित होने वाली पहली संगीतकार बनीं। यह उनके दशकों लंबे संगीत और सेवा के सफर की सबसे बड़ी राष्ट्रीय मान्यताओं में से एक थी।

पति सदाशिवम के जाने के बाद बदल गई जिंदगी

एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी की जिंदगी में उनके पति टी. सदाशिवम की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण थी। उन्होंने उनके करियर को आकार देने और उनके संगीत को बड़े स्तर तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई।

1997 में सदाशिवम के निधन के बाद सुब्बुलक्ष्मी ने सार्वजनिक कार्यक्रमों से लगभग दूरी बना ली। उनका अंतिम सार्वजनिक प्रदर्शन भी 1997 के आसपास ही माना जाता है।

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इसके बाद वह ज्यादा समय निजी जीवन और आध्यात्मिक गतिविधियों में बिताने लगीं। जिस आवाज ने दशकों तक मंचों को रोशन किया था, वह धीरे-धीरे सार्वजनिक जीवन से दूर हो गई।

आखिरी विदाई भी कुछ अलग थी…

11 दिसंबर 2004 को चेन्नई में 88 वर्ष की उम्र में एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी का निधन हो गया। संगीत की दुनिया ने उस दिन अपनी सबसे महान आवाजों में से एक को खो दिया।

उनकी अंतिम विदाई से जुड़ा एक भावुक किस्सा भी लंबे समय से सुनाया जाता है। परिवार और करीबी लोगों की स्मृतियों में यह बात आती है कि अंतिम संस्कार के दौरान अचानक बारिश शुरू हो गई थी। इसे उनके चाहने वालों ने एक भावनात्मक और आध्यात्मिक संकेत की तरह देखा—मानो प्रकृति भी इस महान गायिका को अंतिम विदाई दे रही हो।

हालांकि इस खास बारिश वाले प्रसंग की स्वतंत्र और ठोस अखबारी पुष्टि उपलब्ध नहीं मिलती, इसलिए इसे प्रमाणित तथ्य के बजाय करीबी लोगों से जुड़ी स्मृति और प्रचलित किस्से के रूप में ही देखना उचित है। इतना जरूर है कि 11 दिसंबर को चेन्नई में उनका अंतिम संस्कार हुआ और उनके निधन के साथ भारतीय संगीत के एक युग का अंत माना गया।

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एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी नहीं रहीं, मगर उनकी आवाज आज भी दिलों में जिंदा है

आज भी जब किसी मंदिर में सुबह ‘वेंकटेश्वर सुप्रभातम’ की धुन बजती है, जब किसी घर में ‘विष्णु सहस्रनामम्’ सुनाई देता है या जब कोई ‘भज गोविंदम्’ की उनकी आवाज सुनता है, तो ऐसा लगता है जैसे एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी कहीं गई ही नहीं हैं।

वह शरीर से भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज अब भी लाखों-करोड़ों लोगों की सुबह का हिस्सा है। उनकी गायकी ने शास्त्रीय संगीत को आम लोगों के घरों तक पहुंचाया और भक्ति को ऐसी आवाज दी, जिसे सुनकर भाषा की दीवारें भी छोटी लगने लगती हैं।

एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी की सबसे बड़ी विरासत शायद उनके पुरस्कार नहीं, बल्कि वह भाव है जो उनकी आवाज सुनते ही मन में पैदा होता है।

एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी नहीं रहीं, मगर उनकी आवाज आज भी दिलों में जिंदा है—और उनकी आवाज सुनते ही लगता है, जैसे भक्ति का कोई दीप आज भी भीतर जल उठा हो।

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Byआभा शुक्ला
आभा शुक्ला पत्रकारिता, जनसंपर्क और कॉर्पोरेट कम्युनिकेशन के क्षेत्र में 5+ वर्षों के अनुभव वाली पत्रकार एवं कम्युनिकेशन प्रोफेशनल हैं। पटना से जुड़ीं आभा को समाचार शोध, रिपोर्टिंग, कंटेंट डेवलपमेंट, मीडिया आउटरीच और जनसंपर्क अभियानों का अनुभव है। उन्होंने Zee News में ट्रेनी जर्नलिस्ट के रूप में समाचार शोध, रिपोर्टिंग और कंटेंट डेवलपमेंट का अनुभव हासिल किया। इसके बाद UNE Consultant में PR Executive के तौर पर मीडिया आउटरीच, PR कैंपेन और कॉर्पोरेट इवेंट्स पर काम किया। TCS में Associate के रूप में उन्होंने डेटा मैनेजमेंट, रिसर्च और सूचना प्रबंधन से जुड़ी जिम्मेदारियां संभालीं। आभा शुक्ला तथ्यपरक, शोध-आधारित और प्रभावी पत्रकारिता के माध्यम से सामाजिक एवं समसामयिक मुद्दों को पाठकों तक पहुंचाने में रुचि रखती हैं।
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